अरे मन समझ समझ पग धरिये
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | अरे मन समझ समझ पग धरिये | Are man samajh samajh pag dhariye | अरे मन, समझ-बूझकर पग रखो। |
| स्थायी | अरे मन इस जग में नहीं अपना | Are man is jag men nahin apna | अरे मन, इस जग में अपना कोई नहीं। |
| स्थायी | कोई परछांई सों डरिये | Koi parchhaain son dariye | परछाईं से भी डरो। |
| अंतरा | दौलत दुनियां कुटुम कबीला | Daulat duniyaan kutum kabila | दौलत, दुनिया, कुटुंब और कबीला— |
| अंतरा | इन सौं नेह न कबहु न करिये | In saun neh na kabahu na kariye | इनसे कभी नेह न करो। |
| अंतरा | राम नाम सुखधाम जगतपति | Ram naam sukhdhaam jagatpati | राम का नाम सुखधाम है; वे जगत के स्वामी हैं। |
| अंतरा | सुमिरन सौं जग तरिये | Sumiran saun jag tariye | स्मरण से संसार पार करो। |
शब्दार्थ
पग धरिये का अर्थ पैर रखना है, यहाँ सोच-समझकर आचरण करने का भाव है। नेह स्नेह या लगाव है और कुटुम तथा कबीला परिवार और कुल को कहते हैं। सुमिरन भगवान का स्मरण है और तरिये में संसार के बंधनों से पार होने का भाव है।