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हरि बिन तेरा कौन सहाई

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग आसावरी
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी हरि बिन तेरा कौन सहाई Hari bin tera kaun sahaai हरि के बिना तेरा सहारा कौन है?
स्थायी हरि बिन काके मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई Hari bin kaake maat pita sut banita ko kaahu ko bhaai हरि के बिना माता, पिता, पुत्र और पत्नी किसके हैं, और कौन किसका भाई है?
अंतरा धन धरनी अरु संपति नगरी Dhan dharani aru sampati nagari धन, धरती, संपत्ति और नगर—
अंतरा ओ मान्यो अपनाई O maanyo apanaai इन्हें तूने अपना मान लिया है।
अंतरा तन छूटे कछु संग न चाले Tan chhute kachhu sang na chaale शरीर छूटने पर इनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता।
अंतरा कहाता ही लपटाई हरि बिन Kahaata hi lapataai Hari bin ‘कहाता ही लपटाई हरि बिन’।

शब्दार्थ

सहाई सहायक या सहारा है और बनिता पत्नी को कहते हैं। धरनी धरती या भूमि है, जबकि अपनाई किसी वस्तु को अपना मानने का भाव है। सांसारिक अपनत्व और शरीर छूटने का विरोध हरि की शरण लेने की पुकार को गहरा करता है।

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