का रि करूं मैं एक पल न माने
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | का रि करूं मैं एक पल न माने | Ka ri karun main ek pal na maane | क्या करूँ, सखि? एक पल भी नहीं मानता। |
| स्थायी | जियरा पिया बिन आज अब मैं | Jiyara piya bin aaj ab main | प्रिय के बिना मेरा मन—आज, अब मैं… |
| अंतरा | दिन तैं रैन भई रैन तैं दिन | Din tain rain bhai rain tain din | दिन से रात हुई और रात से दिन। |
| अंतरा | राह तकत हूँ उन के अवन की | Raah takat hun un ke avan ki | मैं उनके आने की राह देखती हूँ। |
| अंतरा | कासे कहूं अपने जीया की अब | Kaase kahun apne jiya ki ab | अब अपने जी की बात किससे कहूँ? |
शब्दार्थ
जियरा मन या हृदय का स्नेहपूर्ण रूप है। राह तकत किसी के आने की बाट देखने को कहता है। रैन रात है और कासे में किसी से अपनी बात कहने का प्रश्न है।