कान्हा मोहे आसावरी राग सुनाये
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | कान्हा मोहे आसावरी राग सुनाये | Kanha mohe Asavari raag sunaaye | कान्हा मुझे आसावरी राग सुनाते हैं। |
| स्थायी | ग नि को आरोहन में छुपाये | Ga ni ko aarohan men chhupaaye | आरोह में ग और नि को छिपाते हैं। |
| अंतरा | धैवत वादी गा समवादी | Dhaivat vaadi ga samvaadi | धैवत वादी है और गा समवादी। |
| अंतरा | मध्यम सुर ग्रह न्यास सु पंचम | Madhyam sur grah nyaas su pancham | मध्यम ग्रह स्वर है और पंचम न्यास स्वर। |
| अंतरा | अवरोहन सं पूरन दिखावत | Avrohan san puran dikhaavat | अवरोह में स्वरों की पूर्णता दिखाते हैं। |
शब्दार्थ
आरोहन चढ़ते हुए और अवरोहन उतरते हुए स्वर-क्रम को कहते हैं। ग्रह आरंभ का स्वर है और न्यास वह स्वर जहाँ वाक्य ठहरता है। वादी और समवादी प्रधान तथा सहचर स्वर की पहचान देते हैं।