अनत कहा जिन जावो पिया
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | अनत कहा जिन जावो पिया | Anat kaha jin jaavo piya | प्रिय, कहीं और मत जाओ। |
| स्थायी | मोरे ही रहिये | More hi rahiye | मेरे ही पास रहो। |
| स्थायी | ए मोरे धाम श्याम तुम | E more dhaam Shyam tum | ऐ श्याम, मेरे धाम, तुम— |
| अंतरा | जनम जनम निसि दिन हूँ तेरी | Janam janam nisi din hun teri | जन्म-जन्म, रात-दिन मैं तेरी हूँ। |
| अंतरा | हूँ थारी चरनन की चेरी | Hun thaari charanan ki cheri | मैं तुम्हारे चरणों की दासी हूँ। |
| अंतरा | बिनति सुमन सुन लीजे मेरी | Binati suman sun lije meri | मेरी विनती सुन लीजिए—‘सुमन’। |
| अंतरा | प्रभु गुलाब ब्रिज जीवन माधो | Prabhu gulaab Brij jivan Madho | प्रभु—‘गुलाब’—ब्रिज के जीवन माधो। |
| अंतरा | सुंदर श्याम तुम | Sundar Shyam tum | तुम, सुंदर श्याम। |
शब्दार्थ
अनत का अर्थ अन्यत्र है और जिन में न जाने की मनाही है। चेरी दासी को कहता है, यहाँ प्रिय के चरणों में समर्पण का भाव है। निसि दिन रात-दिन है और बिनति प्रार्थना है।