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अनत कहा जिन जावो पिया

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरव
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी अनत कहा जिन जावो पिया Anat kaha jin jaavo piya प्रिय, कहीं और मत जाओ।
स्थायी मोरे ही रहिये More hi rahiye मेरे ही पास रहो।
स्थायी ए मोरे धाम श्याम तुम E more dhaam Shyam tum ऐ श्याम, मेरे धाम, तुम—
अंतरा जनम जनम निसि दिन हूँ तेरी Janam janam nisi din hun teri जन्म-जन्म, रात-दिन मैं तेरी हूँ।
अंतरा हूँ थारी चरनन की चेरी Hun thaari charanan ki cheri मैं तुम्हारे चरणों की दासी हूँ।
अंतरा बिनति सुमन सुन लीजे मेरी Binati suman sun lije meri मेरी विनती सुन लीजिए—‘सुमन’।
अंतरा प्रभु गुलाब ब्रिज जीवन माधो Prabhu gulaab Brij jivan Madho प्रभु—‘गुलाब’—ब्रिज के जीवन माधो।
अंतरा सुंदर श्याम तुम Sundar Shyam tum तुम, सुंदर श्याम।

शब्दार्थ

अनत का अर्थ अन्यत्र है और जिन में न जाने की मनाही है। चेरी दासी को कहता है, यहाँ प्रिय के चरणों में समर्पण का भाव है। निसि दिन रात-दिन है और बिनति प्रार्थना है।

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