भैरव लच्छन गाय गुनीवर
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | भैरव लच्छन गाय गुनीवर | Bhairav lachchhan gaay gunivar | गुणी गायक, भैरव के लक्षण गाओ। |
| स्थायी | कोमल सुर ध र ग म नी सुधकर | Komal sur dha ra ga ma ni sudhkar | ध और र कोमल स्वर हैं; ग, म और नी को शुद्ध रखो। |
| स्थायी | प्रात समें री भकत नारी नर | Praat samen ri bhakat naari nar | प्रातःकाल नारी और नर भक्ति में। |
| अंतरा | धैवत होत प्रधान जीव सुर | Dhaivat hot pradhaan jiv sur | धैवत प्रधान, जीव स्वर होता है। |
| अंतरा | रेखव सहचर होंत पुरस्सर | Rekhav sahachar hont purassar | रेखव सहचर होकर अग्रणी रहता है। |
| अंतरा | मालव ठाठ लिखत अति सूंदर | Malav thaath likhat ati sundar | मालव ठाठ अति सुंदर लिखा जाता है। |
| अंतरा | भक्ती रस सों गाय गुनि चतुर | Bhakti ras son gaay guni Chatur | गुणी चतुर भक्ति-भाव से गाते हैं। |
शब्दार्थ
लच्छन पहचान कराने वाले गुण हैं और गुनीवर गुणवान संगीतज्ञ को संबोधित करता है। जीव सुर उस स्वर को कहता है जिससे राग में विशेष प्राण आते हैं। भक्ती रस भक्ति-भाव है और ठाठ स्वरों का एक ढाँचा है। पुरस्सर में अग्रणी होने का भाव है और सुधकर स्वरों को शुद्ध रखने को कहता है।