बिना हरि कौंन खबर मोरी लेत
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | बिना हरि कौंन खबर मोरी लेत | Bina Hari kaun khabar mori let | हरि के बिना मेरी खबर कौन लेता है? |
| अंतरा | काहे को सोच करे मन मूरख | Kaahe ko soch kare man murakh | मूर्ख मन, तू चिंता क्यों करता है? |
| अंतरा | नित उठि भोजन देत | Nit uthi bhojan det | हर दिन उठने पर वे भोजन देते हैं। |
शब्दार्थ
खबर लेत किसी की सुध लेने और देखभाल करने को कहता है। यहाँ सोच का अर्थ चिंता है, केवल विचार नहीं। नित उठि भोजन के भरोसे को हर दिन जागने की दिनचर्या से जोड़ता है।