धैवत कोमल कर
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | धैवत कोमल कर | Dhaivat komal kar | धैवत को कोमल करो। |
| स्थायी | रेखब सुर कोमल | Rekhab sur komal | रेखब स्वर कोमल है। |
| स्थायी | मंदर स्थान मधुर | Mandar sthaan madhur | मंद्र स्थान मधुर है। |
| स्थायी | भैरव शांति प्रचुर | Bhairav shaanti prachur | भैरव में शांति भरपूर है। |
| अंतरा | धैवत अंश बिचर | Dhaivat ansh bichar | धैवत को अंश स्वर मानो। |
| अंतरा | रेखब कर सहचर | Rekhab kar sahachar | रेखब को उसका सहचर बनाओ। |
| अंतरा | संपूरन सूंदर | Sampuran sundar | संपूर्ण और सुंदर। |
शब्दार्थ
कोमल स्वर अपने शुद्ध रूप से नीचा होता है और मंदर स्थान मंद्र सप्तक को कहता है। अंश मुख्य स्वर को पहचान देता है और सहचर का अर्थ साथी है। संपूरन सातों स्वरों के प्रयोग का बोध कराता है। बिचर में विचार करने या मानने का भाव है।