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धन धन मूरत कृष्ण मुरारी

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरव
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी धन धन मूरत कृष्ण मुरारी Dhan dhan murat Krishna Murari धन्य है, धन्य है कृष्ण मुरारी की मूरत।
स्थायी सुलच्छन गिरिधारी छबि सुंदर लागे अति प्यारी Sulachchhan Giridhari chhabi sundar laage ati pyaari सुलक्षण गिरिधारी, तुम्हारी सुंदर छवि अत्यंत प्यारी लगती है।
अंतरा बंसीधर मनमोहन सुहावे Bansidhar Manmohan suhaave बंसी धारण करने वाले मनमोहन सुहावने लगते हैं।
अंतरा बलि बलि जाऊं मोरे मन भावे Bali bali jaaun more man bhaave मैं उन पर बार-बार बलिहारी जाऊँ; वे मेरे मन को भाते हैं।
अंतरा सबरंग ज्ञान बिचारी Sabarang gyaan bichaari सबरंग इस ज्ञान पर विचार करता है।

शब्दार्थ

मुरारी और गिरिधारी कृष्ण के नाम हैं, जिनमें मुर का वध करने और पर्वत उठाने का स्मरण है। बंसीधर बाँसुरी धारण करने वाले हैं और मनमोहन मन को मोहित करने वाले। बलि बलि प्रेम और भक्ति में बार-बार अपने को अर्पित करने का भाव है। ज्ञान जानने-बूझने का भाव है और बिचारी विचार या मनन को कहता है।

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