गुरु नाथा सबन के नित सुमरे मन जीवित छिन भंगुर
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | गुरु नाथा सबन के नित सुमरे मन जीवित छिन भंगुर | Guru naatha saban ke nit sumare man jivit chhin bhangur | हे मन, सबके गुरु और स्वामी का नित्य स्मरण कर; जीवन क्षणभंगुर है। |
| अंतरा | जो चाहे तु चतुर सुख संपद | Jo chaahe tu Chatur sukh sampad | चतुर, यदि तू सुख और संपदा चाहता है, |
| अंतरा | मंगल नाम कमल सुख संवद | Mangal naam kamal sukh sanvad | मंगलमय नाम; ‘कमल सुख संवद’। |
| अंतरा | जाकि कृपा सब पुरत काम | Jaaki kripa sab purat kaam | जिनकी कृपा से सभी काम पूरे होते हैं। |
शब्दार्थ
नाथ गुरु या स्वामी का संबोधन है और छिन भंगुर जीवन की क्षणिकता को कहता है। संपद समृद्धि है और कृपा अनुग्रह या करुणा का भाव है। यहाँ चतुर को सीधे संबोधित किया गया है।