मेहर की नजर कीजे
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | मेहर की नजर कीजे | Mehar ki najar kije | मुझ पर मेहर की नज़र कीजिए। |
| स्थायी | सुख संपद सब दीजे | Sukh sampad sab dije | सुख और सभी संपदाएँ दीजिए। |
| स्थायी | तू करीम करतार | Tu Karim Kartar | आप करीम हैं, सृष्टि के कर्ता हैं। |
| अंतरा | नित उठि आस तिहारी | Nit uthi aas tihaari | मैं प्रतिदिन उठकर आपसे आशा रखता हूँ। |
| अंतरा | साफ नजर तेरे दर का भिकारी | Saaf najar tere dar ka bhikaari | सच्ची नज़र के साथ मैं आपके द्वार का भिखारी हूँ। |
| अंतरा | जग में करम फजल की शरम रख लीजे | Jag men karam phajal ki sharam rakh lije | जगत में अपने करम और अनुग्रह की लाज रख लीजिए। |
शब्दार्थ
मेहर की नजर करुणा भरी दृष्टि की याचना है और दर वह द्वार है जहाँ वक्ता भिखारी बना खड़ा है। करीम उदारता का बोध कराता है और करतार सृष्टिकर्ता का संबोधन है। करम और फजल कृपा तथा अनुग्रह के शब्द हैं; उनकी लाज रखने की प्रार्थना उसी दया को पाने की पुकार है।