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मेहर की नजर कीजे

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरव
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी मेहर की नजर कीजे Mehar ki najar kije मुझ पर मेहर की नज़र कीजिए।
स्थायी सुख संपद सब दीजे Sukh sampad sab dije सुख और सभी संपदाएँ दीजिए।
स्थायी तू करीम करतार Tu Karim Kartar आप करीम हैं, सृष्टि के कर्ता हैं।
अंतरा नित उठि आस तिहारी Nit uthi aas tihaari मैं प्रतिदिन उठकर आपसे आशा रखता हूँ।
अंतरा साफ नजर तेरे दर का भिकारी Saaf najar tere dar ka bhikaari सच्ची नज़र के साथ मैं आपके द्वार का भिखारी हूँ।
अंतरा जग में करम फजल की शरम रख लीजे Jag men karam phajal ki sharam rakh lije जगत में अपने करम और अनुग्रह की लाज रख लीजिए।

शब्दार्थ

मेहर की नजर करुणा भरी दृष्टि की याचना है और दर वह द्वार है जहाँ वक्ता भिखारी बना खड़ा है। करीम उदारता का बोध कराता है और करतार सृष्टिकर्ता का संबोधन है। करम और फजल कृपा तथा अनुग्रह के शब्द हैं; उनकी लाज रखने की प्रार्थना उसी दया को पाने की पुकार है।

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