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प्याला मुझ भर दे रे मतवारे मोरे

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरव
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी प्याला मुझ भर दे रे मतवारे मोरे Pyaala mujh bhar de re matavaare more मेरे मतवाले प्रिय, मेरे लिए प्याला भर दो।
स्थायी बीत गई ली सिगरी रैन भई ली भोर Bit gai li sigari rain bhai li bhor सारी रात बीत गई और भोर हो गई।
अंतरा हम तुम पीवें छका छकावें Ham tum piven chhaka chhakaaven हम दोनों जी भरकर पिएँ और एक-दूसरे को पिलाएँ।
अंतरा दुरजन लुगवा देख डरावें Durajan lugava dekh daraaven दुर्जन—‘लुगवा’—देखकर डराते हैं।
अंतरा कर लीयो अति शोर Kar liyo ati shor उन्होंने बहुत शोर मचा दिया है।

शब्दार्थ

मतवारे में मद से भरे प्रिय का संबोधन है, चाहे वह पेय का नशा हो या गीत के भाव का। छका छकावें में स्वयं जी भरकर पीने और दूसरे को पिलाने की बात साथ आती है। सिगरी का अर्थ सारी है और शोर आसपास उठते कोलाहल को कहता है।

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