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साधो बिद्याधर गुन निधान गुनदाता

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरव
विधा ध्रुपद
ताल सूलताल · 10 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी साधो बिद्याधर गुन निधान गुनदाता Saadho bidyaadhar gun nidhaan gunadaata हे साधक, विद्या के धारक, गुणों के भंडार और दाता।
स्थायी सरस्वति माता को आदेस Saraswati maata ko aades माता सरस्वती को प्रणाम।
अंतरा नमो नमो रिध सिध के स्वामी सकल बिद्या परवेस Namo namo ridh sidh ke svaami sakal bidya paraves रिद्धि-सिद्धि के स्वामी और सभी विद्याओं में निपुण को बार-बार नमन।
संचारी जो इनको ध्यावे मन इच्छा फल पावे Jo inako dhyaave man ichchha phal paave जो इनका ध्यान करता है, वह मनचाहा फल पाता है।
संचारी दूर होत क्लेस Dur hot kles क्लेश दूर हो जाते हैं।
आभोग तानसेन के प्रभु तुमही को ध्यावे Tansen ke prabhu tumahi ko dhyaave तानसेन के प्रभु, केवल तुम्हारा ध्यान किया जाता है।
आभोग ब्रह्मा विष्णु महेस Brahma Vishnu Mahesh ब्रह्मा, विष्णु और महेश।

शब्दार्थ

साधो साधक या संत का संबोधन है। बिद्या ज्ञान या सीख है और गुन गुणों या निपुणता को कहता है। आदेस प्रणाम है। रिध और सिध समृद्धि तथा सिद्धि का भाव देते हैं, जबकि क्लेस पीड़ा या संताप है।

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