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आली देखो भोर भई

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग भैरवी
विधा धमार (विधा)
ताल धमार (ताल) · 14 मात्राएँ
लय विलंबित

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी आली देखो भोर भई Aali dekho bhor bhai सखि, देखो, भोर हो गई।
स्थायी लोग जागे पवन जागे Log jaage pavan jaage लोग जागे और पवन जागी।
स्थायी पंछि जागे गगन बिराजे Panchhi jaage gagan biraaje पंछी जागे और आकाश में शोभते हैं।
अंतरा प्रेम अलाप कछु Prem alaap kachhu प्रेम का कुछ आलाप—
अंतरा सुनत हू नाहिं कहा करूं मोरे Sunat hu naahin kaha karun more नहीं सुनाई देता; क्या करूँ? मेरे—
अंतरा प्रान जावत Praan jaavat प्राण जा रहे हैं।

शब्दार्थ

आली सखी को पुकारने का शब्द है और भोर प्रभात है। अलाप यहाँ गीत का खुलता हुआ स्वर या भाव है। प्रान जीवन-श्वास को कहता है, जिससे वक्ता की विरह-व्यथा व्यक्त होती है।

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