धन घरी धन सुदिन
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | धन घरी धन सुदिन | Dhan ghari dhan sudin | धन्य यह घड़ी, धन्य यह शुभ दिन। |
| स्थायी | धन धन मुहूरत | Dhan dhan muhurat | धन्य-धन्य है मुहूरत। |
| स्थायी | धन धन सखी धन आज की बेंलि | Dhan dhan sakhi dhan aaj ki benli | धन्य-धन्य, सखी, धन्य आज की शुभ बेला। |
| अंतरा | धन धन बिंद्रावन | Dhan dhan Bindravan | धन्य-धन्य है बिंद्रावन। |
| अंतरा | धन बंसि बट धन | Dhan bansi bat dhan | धन्य है बंसिबट, धन्य। |
| अंतरा | धन सरित सिरि जमुना | Dhan sarit siri Jamuna | धन्य है श्री जमुना नदी। |
| अंतरा | कान्हु करत केलि | Kanhu karat keli | कान्हु क्रीड़ा करते हैं। |
शब्दार्थ
धन आशीष या प्रशंसा का दोहराया हुआ शब्द है। सुदिन शुभ दिन है और मुहूरत शुभ समय। बंसि बाँसुरी है, बट वट-वृक्ष है, सरित नदी है और केलि क्रीड़ा को कहता है।