जाय तू मन गुरु चरन शरन
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | जाय तू मन गुरु चरन शरन | Jaay tu man guru charan sharan | हे मन, गुरु के चरणों की शरण में जा। |
| स्थायी | एक भाव धर अंतर मों धन | Ek bhaav dhar antar mon dhan | अपने अंतर में एकनिष्ठ भक्ति का भाव धारण कर। |
| अंतरा | जोइ जावत जन सद्गुरु के शरन | Joi jaavat jan sadguru ke sharan | जो जन सद्गुरु की शरण में जाता है, |
| अंतरा | वाको हरत चतुर भवबंधन | Vaako harat Chatur bhavabandhan | चतुर, उसके भव के बंधन हर लिए जाते हैं। |
शब्दार्थ
चरन शरन गुरु के चरणों में आश्रय लेने का भाव है। एक भाव अखंड और एकनिष्ठ भक्ति की मनोदशा को कहता है। भवबंधन संसार में बाँधे रखने वाले बंधनों का नाम है।