सोच मना तु कौन घट मैं
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सोच मना तु कौन घट मैं | Soch mana tu kaun ghat main | हे मन, विचार कर: तू किस घट में रहता है? |
| अंतरा | कहाँ से तु आयो कहाँ जावेगो | Kahaan se tu aayo kahaan jaavego | तू कहाँ से आया है और कहाँ जाएगा? |
| अंतरा | भेजा तुझको कौन घट में | Bheja tujhko kaun ghat men | तुझे इस घट में किसने भेजा? |
| अंतरा | क्या तू लायो क्या ले जावेगो | Kya tu laayo kya le jaavego | तू क्या लाया था और क्या साथ ले जाएगा? |
| अंतरा | मालिक सबका कौन घट मैं | Maalik sabka kaun ghat main | सबका मालिक किस घट में रहता है? |
शब्दार्थ
घट पात्र है और यहाँ शरीर को निवास-स्थान की तरह देखने का भाव देता है। आने-जाने और साथ लाई वस्तुओं के प्रश्न मन को अपने मूल तथा अपनी सीमाओं की ओर मोड़ते हैं। मालिक सबके स्वामी का बोध कराता है।