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आज तुम भोर भोर हि आये

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग विभास
विधा ख़याल
ताल रूपक · 7 मात्राएँ
लय विलंबित

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी आज तुम भोर भोर हि आये Aaj tum bhor bhor hi aaye आज तुम एकदम भोर में ही आए हो।
स्थायी होरि मचाये ऐसे हो तुम चतुर खेलारि Hori machaaye aise ho tum chatur khelaari होरि मचाते हो; ऐसे चतुर खिलाड़ी हो तुम।
अंतरा छीन लूंगि मुकुट मुरली Chhin lungi mukut murali मैं मुकुट और मुरली छीन लूँगी।
अंतरा और मलूंगी मुख रोरी Aur malungi mukh rori और मुख पर रोरी मलूँगी।

शब्दार्थ

भोर भोर सवेरे के समय को विशेष रूप से उभारता है। होरि रंगों के त्योहार की चंचल क्रीड़ा है और खेलारि उसमें निपुण भागीदार को कहता है। रोरी मुख पर मली जाने वाली लाल रंग की सामग्री है, जिससे छेड़छाड़ का उत्तर उतनी ही चंचल धमकी में दिया जाता है।

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