आज तुम भोर भोर हि आये
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | आज तुम भोर भोर हि आये | Aaj tum bhor bhor hi aaye | आज तुम एकदम भोर में ही आए हो। |
| स्थायी | होरि मचाये ऐसे हो तुम चतुर खेलारि | Hori machaaye aise ho tum chatur khelaari | होरि मचाते हो; ऐसे चतुर खिलाड़ी हो तुम। |
| अंतरा | छीन लूंगि मुकुट मुरली | Chhin lungi mukut murali | मैं मुकुट और मुरली छीन लूँगी। |
| अंतरा | और मलूंगी मुख रोरी | Aur malungi mukh rori | और मुख पर रोरी मलूँगी। |
शब्दार्थ
भोर भोर सवेरे के समय को विशेष रूप से उभारता है। होरि रंगों के त्योहार की चंचल क्रीड़ा है और खेलारि उसमें निपुण भागीदार को कहता है। रोरी मुख पर मली जाने वाली लाल रंग की सामग्री है, जिससे छेड़छाड़ का उत्तर उतनी ही चंचल धमकी में दिया जाता है।