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मनहरवा रे मनहरवा रे मैंका

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग अल्हैया बिलावल
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी मनहरवा रे मनहरवा रे मैंका Manaharava re manaharava re mainka मनिहार, ओ मनिहार, मेरे लिए,
स्थायी हरि हरि चुरियां दे हो मंगाय Hari hari churiyaan de ho mangaay हरी-हरी चूड़ियाँ मँगवा दो।
स्थायी रंग रंगीली और चटकीली Rang rangili aur chatakili रंग-बिरंगी और चटकीली,
स्थायी ता पर धनक टंकेली Ta par dhanak tankeli उन पर चमकीली सजावट टँकी हो।
अंतरा और गले को हार लूंगी Aur gale ko haar lungi और गले के लिए हार लूँगी।
अंतरा मोतियन थाल भरूंगी Motiyan thaal bharungi मोतियों से थाल भरूँगी।
अंतरा खरक खरक मोरी चुरियां खरकें Kharak kharak mori churiyaan kharaken मेरी चूड़ियाँ खनक-खनककर बजती हैं।
अंतरा बंगरि मुरक गड़ली Bangari murak garali ‘बंगरि मुरक गड़ली’।

शब्दार्थ

मनहरवा मनिहार का संबोधन है, जबकि हरि हरि यहाँ हरी चूड़ियों का रंग है, देवता का नाम नहीं। धनक चूड़ियों पर लगी चमकीली सजावट का भाव देता है। खरक की पुनरावृत्ति आभूषणों की खनक सुनाती है।

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