रब सों नेह लगा तु मनवा
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| राग | अल्हैया बिलावल |
| विधा | ख़याल |
| ताल | तीनताल · 16 मात्राएँ |
| लय | मध्य |
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | रब सों नेह लगा तु मनवा | Rab son neh laga tu manava | हे मन, प्रभु से प्रेम लगा। |
| स्थायी | दूजो नाहिं शरनवा | Dujo naahin sharanava | दूसरा कोई आश्रय नहीं है। |
| अंतरा | सांचो सुखी कोउ जग में न दीसत | Saancho sukhi kou jag men na disat | जगत में कोई सच्चे अर्थ में सुखी नहीं दिखाई देता। |
| अंतरा | हररंग मान बचनवा | Harrang maan bachanava | हररंग, इन वचनों को मान। |
शब्दार्थ
नेह प्रेम का लगाव है और रब प्रभु का संबोधन है। शरनवा में आश्रय का भाव है, जबकि बचनवा कही गई सीख को कहता है। सांचो सुखी बाहरी रूप के बजाय सच्चे सुख की बात करता है।