आज मन बस गई सांवरे कि सुरतिया
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | आज मन बस गई सांवरे कि सुरतिया | Aaj man bas gai Saanvare ki suratiya | आज साँवरे प्रिय की छवि मन में बस गई है। |
| स्थायी | प्यारि प्यारि सखि रि कहा कहुँ तोसे अपने जिया कि बीति आली री | Pyaari pyaari sakhi ri kaha kahun tose apne jiya ki biti aali ri | प्यारी-प्यारी सखी, अपने हृदय की बीती तुमसे क्या कहूँ? |
| स्थायी | वाहु के बिन देखे कल न परत मोको | Vaahu ke bin dekhe kal na parat moko | उन प्रिय को देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। |
| अंतरा | हा हा करत तोरे पैंयां परत हूँ | Ha ha karat tore painyaan parat hun | बार-बार विनती करती मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ। |
| अंतरा | जो पिया आन मिले मोरि सजनी | Jo piya aan mile mori sajani | मेरी सजनी, यदि प्रिय आकर मुझसे मिलें, |
| अंतरा | मैं तो चेरी सनद भइ तेरि | Main to cheri Sanad bhai teri | मैं सनद तो तुम्हारी दासी हो गई हूँ। |
शब्दार्थ
सुरतिया प्रिय की स्मृति में बसी छवि है, जो अब हृदय में ठहर गई है। कल न परत चैन या विश्राम न मिलने को कहता है। पैंयां परत और चेरी में विनय तथा समर्पित सेवा का भाव है।