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आज मन बस गई सांवरे कि सुरतिया

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग काफ़ी
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी आज मन बस गई सांवरे कि सुरतिया Aaj man bas gai Saanvare ki suratiya आज साँवरे प्रिय की छवि मन में बस गई है।
स्थायी प्यारि प्यारि सखि रि कहा कहुँ तोसे अपने जिया कि बीति आली री Pyaari pyaari sakhi ri kaha kahun tose apne jiya ki biti aali ri प्यारी-प्यारी सखी, अपने हृदय की बीती तुमसे क्या कहूँ?
स्थायी वाहु के बिन देखे कल न परत मोको Vaahu ke bin dekhe kal na parat moko उन प्रिय को देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता।
अंतरा हा हा करत तोरे पैंयां परत हूँ Ha ha karat tore painyaan parat hun बार-बार विनती करती मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ।
अंतरा जो पिया आन मिले मोरि सजनी Jo piya aan mile mori sajani मेरी सजनी, यदि प्रिय आकर मुझसे मिलें,
अंतरा मैं तो चेरी सनद भइ तेरि Main to cheri Sanad bhai teri मैं सनद तो तुम्हारी दासी हो गई हूँ।

शब्दार्थ

सुरतिया प्रिय की स्मृति में बसी छवि है, जो अब हृदय में ठहर गई है। कल न परत चैन या विश्राम न मिलने को कहता है। पैंयां परत और चेरी में विनय तथा समर्पित सेवा का भाव है।

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