एरि ए मैं कौने जतन सों
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| राग | काफ़ी |
| विधा | धमार (विधा) |
| ताल | धमार (ताल) · 14 मात्राएँ |
| लय | विलंबित |
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | एरि ए मैं कौने जतन सों | Eri e main kaune jatan son | सखी, मैं किस जतन से— |
| स्थायी | खोलौं मोरे पीया के मन में परि गांठ | Kholaun more piya ke man men pari gaanth | अपने प्रिय के मन में पड़ी गाँठ खोलूँ? |
| अंतरा | सब सखियां मिली | Sab sakhiyaan mili | सब सखियाँ मिलीं। |
| अंतरा | बन बन आईं | Ban ban aain | वे सज-धजकर आईं। |
| अंतरा | मैं बैठी बिख घोलौं | Main baithi bikh gholaun | मैं बैठी विष घोल रही हूँ। |
शब्दार्थ
जतन उपाय या साधन को कहता है। गाँठ किसी बंधन की गाँठ है, जो यहाँ प्रिय के मन में पड़ी है। सखियाँ स्त्री-मित्रों या सहेलियों को कहता है।