गुनि गावत काफि राग
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | गुनि गावत काफि राग | Guni gaavat Kafi raag | गुणी काफि राग गाते हैं। |
| स्थायी | खरहर प्रिय मेल जनित | Kharahar Priya mel janit | खरहर प्रिय मेल से उत्पन्न। |
| स्थायी | कोमल ग नि ऊज्वल पर | Komal ga ni ujval par | ग और नि कोमल हैं, अन्य उज्ज्वल हैं। |
| स्थायी | सुर पंचम वादि साध | Sur pancham vaadi saadh | पंचम स्वर को वादी मानकर साधो। |
| अंतरा | सरल सरूप विपश्चित | Saral sarup vipashchit | सरल स्वरूप वाला यह राग विद्वानों को मान्य है, |
| अंतरा | मानत सब सुध अविकल | Maanat sab sudh avikal | ‘मानत सब सुध अविकल’। |
| अंतरा | आश्रय गुनि चतुर कहत | Aashray guni Chatur kahat | गुणी चतुर इसे आधार कहते हैं। |
| अंतरा | कोमल ग नि ऊज्वल पर | Komal ga ni ujval par | ग और नि कोमल हैं, अन्य उज्ज्वल हैं। |
| अंतरा | सुर पंचम वादि साध | Sur pancham vaadi saadh | पंचम स्वर को वादी मानकर साधो। |
शब्दार्थ
गुनि गुणवान संगीतज्ञ को कहता है और मेल उस स्वर-समूह को जिससे राग की उत्पत्ति बताई जाती है। कोमल स्वर का नीचा रूप है और वादि प्रधान स्वर को पहचान देता है। सरूप का अर्थ स्वरूप है और अविकल में पूरा या अखंड होने का भाव है। विपश्चित विद्वान या विवेकी को कहता है, साध में अभ्यास का निर्देश है और आश्रय आधार को कहता है।