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कदर पिया नैया मोरि कैसे लागे पार

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग काफ़ी
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी कदर पिया नैया मोरि कैसे लागे पार Kadar piya naiya mori kaise laage paar प्रिय कदर, मेरी नैया पार कैसे लगेगी?
स्थायी तु खेवट अनाड़ी हुँ ठाड़ि मझधार Tu khevat anaari hun thaari majhadhaar तुम खेवट हो; मैं अनाड़ी, मझधार में खड़ी हूँ।
अंतरा ना मोरे नैया ना रे खिवैया Na more naiya na re khivaiya मेरे पास न नैया है, न खिवैया।
अंतरा आन पड़ी मझधार Aan pari majhadhaar मैं आकर मझधार में पड़ गई हूँ।
अंतरा कदर पिया नैया मोरि कैसे लागे पार Kadar piya naiya mori kaise laage paar प्रिय कदर, मेरी नैया पार कैसे लगेगी?

शब्दार्थ

नैया छोटी नाव है और खेवट या खिवैया उसे चलाने वाला है। मझधार बीच की धारा है, जहाँ वक्ता स्वयं को राह चलाने में असमर्थ पाती है। पार में दूसरे किनारे के साथ सुरक्षित निकलने की आशा भी है।

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