मन रे सुन पुरान क्या कीता
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | मन रे सुन पुरान क्या कीता | Man re sun puraan kya kita | हे मन, पुरानी सीख सुन: तूने क्या किया? |
| अंतरा | मोह लगन की गेलन छाँड्यो | Moh lagan ki gelan chhaandyo | मोह की लगन और ‘गेलन’ छोड़ दे। |
| अंतरा | काम अमल मद पीता मन रे | Kaam amal mad pita man re | हे मन, तूने कामना का नशा पी लिया है। |
| अंतरा | सुत बनिता बंधु के कारन | Sut banita bandhu ke kaaran | संतान, पत्नी और बंधुओं के लिए, |
| अंतरा | पचि पचि जनम बितीता मन रे | Pachi pachi janam bitita man re | हे मन, तू बार-बार खपकर अपना जीवन बिताता है। |
शब्दार्थ
मोह लगन मन को बाँधने वाली आसक्ति है। अमल और मद नशे का भाव लाते हैं तथा कामना को विवेक खोने से जोड़ते हैं। पचि पचि की पुनरावृत्ति सांसारिक चिंताओं में बार-बार खपने को उभारती है।