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प्रभु तेरी दया है अपार

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग काफ़ी
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी प्रभु तेरी दया है अपार Prabhu teri daya hai apaar प्रभु, तुम्हारी दया अपार है।
स्थायी तु अगम अगोचर अविकल चर अचर Tu agam agochar avikal char achar तुम पहुँच और दृष्टि से परे, पूर्ण और अविचल हो; चर-अचर सबमें हो।
स्थायी सकल क तु धाओ पतितन को उद्धार Sakal ka tu dhaao patitan ko uddhaar ‘सकल क’; पतितों का उद्धार करने को दौड़े आओ।
अंतरा दीन अनाथ पतीत रु दुरबल Din anaath patit ru durabal दीन, अनाथ, पतित और दुर्बल,
अंतरा महद पराधी शरणागत हूँ Mahad paraadhi sharanaagat hun मैं बड़ा अपराधी हूँ और तुम्हारी शरण में हूँ।
अंतरा चतुर तिहा मोंहे पार उतार Chatur tiha monhe paar utaar चतुर तुमसे प्रार्थना करता है: मुझे पार उतारो।

शब्दार्थ

अगम और अगोचर ईश्वर को सामान्य पहुँच और दृष्टि से परे बताते हैं। चर अचर में चल और अचल सब समाए हैं। शरणागत आश्रय लेने वाले को कहते हैं; इस पुकार में संसार के दुखों से पार उतारने की प्रार्थना है।

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