प्रभु तेरी दया है अपार
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | प्रभु तेरी दया है अपार | Prabhu teri daya hai apaar | प्रभु, तुम्हारी दया अपार है। |
| स्थायी | तु अगम अगोचर अविकल चर अचर | Tu agam agochar avikal char achar | तुम पहुँच और दृष्टि से परे, पूर्ण और अविचल हो; चर-अचर सबमें हो। |
| स्थायी | सकल क तु धाओ पतितन को उद्धार | Sakal ka tu dhaao patitan ko uddhaar | ‘सकल क’; पतितों का उद्धार करने को दौड़े आओ। |
| अंतरा | दीन अनाथ पतीत रु दुरबल | Din anaath patit ru durabal | दीन, अनाथ, पतित और दुर्बल, |
| अंतरा | महद पराधी शरणागत हूँ | Mahad paraadhi sharanaagat hun | मैं बड़ा अपराधी हूँ और तुम्हारी शरण में हूँ। |
| अंतरा | चतुर तिहा मोंहे पार उतार | Chatur tiha monhe paar utaar | चतुर तुमसे प्रार्थना करता है: मुझे पार उतारो। |
शब्दार्थ
अगम और अगोचर ईश्वर को सामान्य पहुँच और दृष्टि से परे बताते हैं। चर अचर में चल और अचल सब समाए हैं। शरणागत आश्रय लेने वाले को कहते हैं; इस पुकार में संसार के दुखों से पार उतारने की प्रार्थना है।