सखी अब कैसो करत है मोर सोर
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सखी अब कैसो करत है मोर सोर | Sakhi ab kaiso karat hai mor sor | सखी, अब मोर कैसा शोर कर रहा है! |
| स्थायी | अब कैसो करत है मोर और बोलत है पपीहा जोर जोर | Ab kaiso karat hai mor aur bolat hai papiha jor jor | मोर कैसा शोर करता है और पपीहा ज़ोर-ज़ोर से बोलता है। |
| अंतरा | सुन कोयल की कूक जिया में हूक उठत है | Sun koyal ki kuk jiya men huk uthat hai | कोयल की कूक सुनकर हृदय में हूक उठती है। |
| अंतरा | कदर और कैसे जैयूं नाहीं होवत भोर | Kadar aur kaise jaiyun naahin hovat bhor | कदर, ‘और कैसे जैयूं’; अभी भोर नहीं होती। |
शब्दार्थ
मोर, पपीहा और कोयल की पुकारें परिवेश में गूँजती हैं। कूक कोयल की आवाज़ है, जबकि हूक उसी ध्वनि को हृदय की टीस से जोड़ती है। जोर जोर आवाज़ की तीव्रता को उभारता है। भोर सवेरा है, जिसकी प्रतीक्षा में वक्ता की रात बीत रही है।