जाओ मोहन मोरे फंद परो ना
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | जाओ मोहन मोरे फंद परो ना | Jaao Mohan more phand paro na | जाओ, मोहन; मेरे फंदे में मत पड़ो। |
| स्थायी | कपटि कुटिल हम आप भले हो | Kapati kutil ham aap bhale ho | हम कपटी और कुटिल हैं; आप तो भले हैं। |
| स्थायी | गुन निधान अरु श्याम सलोना | Gun nidhaan aru Shyam salona | श्याम, तुम गुणों के निधान और सलोने हो। |
| अंतरा | मंद मती हम कान्ह चतुर तुम | Mand mati ham Kanha chatur tum | हम मंदबुद्धि हैं; कान्ह, तुम चतुर हो। |
| अंतरा | बिरह बिथा भले हमको सतावत | Birah bitha bhale hamako sataavat | विरह की पीड़ा भले हमें सताए। |
| अंतरा | मंदिर में अब देर परेगी | Mandir men ab der paregi | अब घर पहुँचने में देर पड़ेगी। |
| अंतरा | क्यूं पूछो तुम हमरो रोना | Kyun puchho tum hamaro rona | तुम हमारे रोने के बारे में क्यों पूछते हो? |
शब्दार्थ
फंद फंदा है और परो ना में उसमें न पड़ने को कहा गया है। कपटि कुटिल कपटी और टेढ़े स्वभाव को कहता है; गुन निधान गुणों का भंडार है। मंद मती मंदबुद्धि है, जिसके विपरीत चतुर का भाव है। बिरह बिथा विरह की पीड़ा है और मंदिर यहाँ घर को कहता है।