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जाओ मोहन मोरे फंद परो ना

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग मारवा
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी जाओ मोहन मोरे फंद परो ना Jaao Mohan more phand paro na जाओ, मोहन; मेरे फंदे में मत पड़ो।
स्थायी कपटि कुटिल हम आप भले हो Kapati kutil ham aap bhale ho हम कपटी और कुटिल हैं; आप तो भले हैं।
स्थायी गुन निधान अरु श्याम सलोना Gun nidhaan aru Shyam salona श्याम, तुम गुणों के निधान और सलोने हो।
अंतरा मंद मती हम कान्ह चतुर तुम Mand mati ham Kanha chatur tum हम मंदबुद्धि हैं; कान्ह, तुम चतुर हो।
अंतरा बिरह बिथा भले हमको सतावत Birah bitha bhale hamako sataavat विरह की पीड़ा भले हमें सताए।
अंतरा मंदिर में अब देर परेगी Mandir men ab der paregi अब घर पहुँचने में देर पड़ेगी।
अंतरा क्यूं पूछो तुम हमरो रोना Kyun puchho tum hamaro rona तुम हमारे रोने के बारे में क्यों पूछते हो?

शब्दार्थ

फंद फंदा है और परो ना में उसमें न पड़ने को कहा गया है। कपटि कुटिल कपटी और टेढ़े स्वभाव को कहता है; गुन निधान गुणों का भंडार है। मंद मती मंदबुद्धि है, जिसके विपरीत चतुर का भाव है। बिरह बिथा विरह की पीड़ा है और मंदिर यहाँ घर को कहता है।

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