जगत जननि जगदंब भवानि
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | जगत जननि जगदंब भवानि | Jagat janani Jagadamba Bhavani | जगत की जननी, जगदंबा, भवानि, |
| स्थायी | कृपा करनि दुख हरनि सुख करनि | Kripa karani dukh harani sukh karani | तुम कृपा करती हो, दुख हरती हो और सुख देती हो। |
| स्थायी | प्रणत जन शरनि भव जलधि तरनि | Pranat jan sharani bhav jaladhi tarani | तुम प्रणत जनों को शरण देती हो और भवसागर से तारती हो। |
| अंतरा | मैं पतीत सेवक चरनन को | Main patit sevak charanan ko | मैं पतित हूँ, तुम्हारे चरणों का सेवक हूँ। |
| अंतरा | मुझ पर कृपा दृष्टि अब कीजे | Mujh par kripa drishti ab kije | अब मुझ पर कृपा-दृष्टि कीजिए। |
| अंतरा | महामाय जोगनी शिवानी | Mahamaya jogani Shivani | महामाया, जोगनी, शिवानी, |
| अंतरा | प्रणत जन शरनि भव जलधि तरनि | Pranat jan sharani bhav jaladhi tarani | तुम प्रणत जनों को शरण देती हो और भवसागर से तारती हो। |
शब्दार्थ
जननि माता है। प्रणत जन नमन करने वाले या शरणागत लोग हैं। भव जलधि में संसार को समुद्र माना गया है और तरनि पार लगाने का भाव व्यक्त करता है। कृपा दृष्टि करुणाभरी नज़र है।