काउ कि रीत कोउ करे सखी री
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | काउ कि रीत कोउ करे सखी री | Kaau ki rit kou kare sakhi ri | सखी री, कोई किसी दूसरे की रीति पर कहाँ चलता है? |
| स्थायी | मीत पियरवा जो जो करिये | Mit piyarvaa jo jo kariye | मीत पियरवा, जो भी करते हो, |
| स्थायी | सो सो सब अपने मन की | So so sab apne man ki | वह सब अपने मन का ही करते हो। |
| अंतरा | हों अधीन तन मन धन तुमरे | Hon adhin tan man dhan tumare | मैं तन, मन और धन से तुम्हारे अधीन हूँ। |
| अंतरा | तुम तो मेहरबान सब के | Tum to meharbaan sab ke | तुम तो सब पर मेहरबान हो। |
| अंतरा | सदारंग पर रंग बरसायो | Sadarang par rang barsaayo | तुमने सदारंग पर रंग बरसाया है। |
शब्दार्थ
रीत ढंग या रीति है और कोउ का अर्थ कोई है। पियरवा प्रिय को कहता है। अधीन में किसी के वश या आश्रय में होने का भाव है। मेहरबान कृपालु है। रंग बरसायो में प्रेम का रंग बरसाने का भाव है।