तत बितत घन सुषिर सब मानत
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | तत बितत घन सुषिर सब मानत | Tat bitat ghan sushir sab maanat | सब तार वाले वाद्य, चमड़े से मढ़े ढोल-मृदंग, ठोस शरीर वाले ताल-वाद्य और हवा से बजने वाले वाद्यों को मानते हैं। |
| स्थायी | बाजे चतुर विध शास्त्र बखानत | Baaje chatur vidh shaastr bakhaanat | शास्त्र वाद्यों के चार प्रकार बताते हैं। |
| अंतरा | बीन मृदंग झाँझ सुर लीगत | Bin mridang jhaanjh sur ligat | बीन, मृदंग और झाँझ; उनके सुर—‘लीगत’। |
| अंतरा | भेद अनंत चतुर गुनि जानत | Bhed anant Chatur guni jaanat | गुणी चतुर उनके अनगिनत भेद जानते हैं। |
शब्दार्थ
बाजे वाद्य हैं। तत तार वाले वाद्य, बितत चमड़े से मढ़े ढोल-मृदंग जैसे वाद्य, घन ठोस शरीर वाले ताल-वाद्य और सुषिर हवा से बजने वाले वाद्य हैं। चतुर विध का अर्थ चार प्रकार है और शास्त्र में संगीत के ग्रंथों का भाव है। बीन वीणा है, मृदंग एक ताल-वाद्य है, झाँझ धातु की दो थालियों को आपस में बजाने वाला वाद्य है और सुर स्वर है। भेद प्रकार या अंतर को, अनंत अनगिनत को और गुनि गुणवान संगीतज्ञ को कहता है।