कगवा बोले मोरि अटरिया
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | कगवा बोले मोरि अटरिया | Kagvaa bole mori atariyaa | मेरी अटारी पर कौआ बोल रहा है। |
| स्थायी | टरिया सकुन भइलवा | Tariyaa sakun bhailvaa | अटारी पर शुभ संकेत मिला है। |
| स्थायी | सखि मोरी भुजवा फरकन लागी | Sakhi mori bhujvaa pharkan laagi | सखी, मेरी बाँह फड़कने लगी है। |
| अंतरा | अव न करो तुम मोरे पियरवा | Av na karo tum more piyarvaa | अब ऐसा न करो, मेरे प्रिय। |
| अंतरा | डारुं गरे फूलन के हरवा | Daarun gare phulan ke harvaa | मैं तुम्हारे गले में फूलों की माला डालूँगी। |
| अंतरा | सखि री उन पर तन मन वारी | Sakhi ri un par tan man vaari | सखी, मैं उन पर अपना तन और मन न्योछावर करती हूँ। |
शब्दार्थ
कगवा कौआ है और अटरिया अटारी या ऊपरी छज्जा। सकुन शुभ संकेत है; भुजवा फरकन बाँह फड़कने को कहता है। अव का अर्थ अब है। डारुं गरे में गले में डालने का भाव है और फूलन के हरवा फूलों की माला है। तन मन वारी प्रेम में तन-मन न्योछावर करने को कहता है।