नाथ नाथ कर बोल रसना
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | नाथ नाथ कर बोल रसना | Naath naath kar bol rasnaa | हे जीभ, ‘नाथ, नाथ’ कहो। |
| स्थायी | नाथ नाथ कर बोल रसना | Naath naath kar bol rasnaa | हे जीभ, ‘नाथ, नाथ’ कहो। |
| स्थायी | नाथ नाथ कर बोल रसना | Naath naath kar bol rasnaa | हे जीभ, ‘नाथ, नाथ’ कहो। |
| स्थायी | नाथ नाथ कर बोल रसना | Naath naath kar bol rasnaa | हे जीभ, ‘नाथ, नाथ’ कहो। |
| अंतरा | काहे तु मन बकवाद करत है | Kaahe tu man bakvaad karat hai | हे मन, तू व्यर्थ की बातें क्यों करता है? |
| अंतरा | कृष्ण कृष्ण कहि डोल रसना | Krishna Krishna kahi dol rasnaa | हे रसना, ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहते हुए झूमो। |
| अंतरा | नाथ नाथ कर बोल रसना | Naath naath kar bol rasnaa | हे जीभ, ‘नाथ, नाथ’ कहो। |
शब्दार्थ
नाथ प्रभु का संबोधन है और रसना जीभ को कहता है, जिसे भगवान का नाम गाने को कहा गया है। बकवाद व्यर्थ की बात है। डोल में नाम लेते हुए हिलने या झूमने का भाव है।