सजन तुम काहे न हरि गुन गावो
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सजन तुम काहे न हरि गुन गावो | Sajan tum kaahe na Hari gun gaavo | सजन, तुम हरि के गुण क्यों नहीं गाते? |
| स्थायी | नाहक जनम गमावो | Naahak janam gamaavo | तुम व्यर्थ ही जीवन गँवाते हो। |
| अंतरा | त्रय गुण मोहित अखिल जगत यह | Traya gun mohit akhil jagat yah | यह पूरा जगत प्रकृति के तीन गुणों से मोहित है। |
| अंतरा | नाहक देख लुभावो | Naahak dekh lubhaavo | तुम जो देखते हो, उसी में व्यर्थ लुभा जाते हो। |
शब्दार्थ
सजन मित्र या साथी का स्नेहभरा संबोधन है। हरि गुन ईश्वर के गुण हैं, जबकि त्रय गुण प्रकृति के तीन गुणों का बोध कराता है। अंतिम पुकार देखी हुई वस्तुओं के आकर्षण में खो जाने से सावधान करती है।