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कहाँ नर अपनो जनम गमावे

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग तोड़ी
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी कहाँ नर अपनो जनम गमावे Kahaan nar apno janam gamaave हे नर, अपना जन्म क्यों गँवा रहे हो?
स्थायी माया मद विषया रस राच्यो Maaya mad vishayaa ras raachyo तुम माया, मद और विषयों के रस में डूबे हो।
स्थायी राम शरण नहिं आवे Ram sharan nahin aave पर राम की शरण नहीं आते।
अंतरा यह संसार सकल है सुपनो Yah sansaar sakal hai supno यह सारा संसार एक सपना है।
अंतरा देख कहा लो भावे Dekh kaha lo bhaave देख—‘कहा लो भावे’।
अंतरा जो उपजे सो सकल विनाशो Jo upje so sakal vinaasho जो भी उत्पन्न होता है, वह सब नष्ट होने वाला है।
अंतरा रहन न कोऊ पावे Rahan na kou paave कोई भी सदा बना नहीं रह पाता।

शब्दार्थ

गमावे गँवाने या व्यर्थ बिताने को कहता है। राच्यो गहरे रमे या आसक्त होने का भाव है; विषया रस विषय-सुखों का आकर्षण है। सुपनो सपना है और कोऊ कोई भी। उपजे और विनाशो में उत्पन्न होने तथा नष्ट होने का अंतर है।

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