कहाँ नर अपनो जनम गमावे
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | कहाँ नर अपनो जनम गमावे | Kahaan nar apno janam gamaave | हे नर, अपना जन्म क्यों गँवा रहे हो? |
| स्थायी | माया मद विषया रस राच्यो | Maaya mad vishayaa ras raachyo | तुम माया, मद और विषयों के रस में डूबे हो। |
| स्थायी | राम शरण नहिं आवे | Ram sharan nahin aave | पर राम की शरण नहीं आते। |
| अंतरा | यह संसार सकल है सुपनो | Yah sansaar sakal hai supno | यह सारा संसार एक सपना है। |
| अंतरा | देख कहा लो भावे | Dekh kaha lo bhaave | देख—‘कहा लो भावे’। |
| अंतरा | जो उपजे सो सकल विनाशो | Jo upje so sakal vinaasho | जो भी उत्पन्न होता है, वह सब नष्ट होने वाला है। |
| अंतरा | रहन न कोऊ पावे | Rahan na kou paave | कोई भी सदा बना नहीं रह पाता। |
शब्दार्थ
गमावे गँवाने या व्यर्थ बिताने को कहता है। राच्यो गहरे रमे या आसक्त होने का भाव है; विषया रस विषय-सुखों का आकर्षण है। सुपनो सपना है और कोऊ कोई भी। उपजे और विनाशो में उत्पन्न होने तथा नष्ट होने का अंतर है।