मोरे मन जाय शरन तु मुकंदा
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | मोरे मन जाय शरन तु मुकंदा | More man jaay sharan tu Mukunda | मेरे मन, तू मुकंद की शरण में जा। |
| स्थायी | विमल भाव धर अंतःकरना | Vimal bhaav dhar antahkarnaa | अंतःकरण में निर्मल भाव धारण कर। |
| स्थायी | टूटत सब भव फंदा | Tutat sab bhav phandaa | भव के सब फंदे टूटते हैं। |
| स्थायी | जाय शरन तु मुकंदा | Jaay sharan tu Mukunda | तू मुकंद की शरण में जा। |
| अंतरा | मेरा मेरा ना कछु तेरा | Mera mera na kachhu tera | तू ‘मेरा, मेरा’ कहता है, पर कुछ भी तेरा नहीं। |
| अंतरा | झूंठा कलजुग धंदा | Jhunthaa kaljug dhandaa | कलियुग का यह धंधा झूठा है। |
| अंतरा | दो दिन को जग चतुर समझ सब | Do din ko jag Chatur samajh sab | चतुर, यह सब समझ ले: जग दो दिन का है। |
| अंतरा | सांच एक गोबींदा | Saanch ek Govinda | एक गोविंद ही सत्य हैं। |
शब्दार्थ
विमल भाव निर्मल, निष्कपट भाव है; अंतःकरना अंतःकरण या भीतर के मन को कहता है। भव फंदा में संसार के बंधन फंदों की तरह हैं। धंदा सांसारिक काम-धंधा या व्यवहार है। सांच सत्य है।