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मोरे मन जाय शरन तु मुकंदा

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग तोड़ी
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी मोरे मन जाय शरन तु मुकंदा More man jaay sharan tu Mukunda मेरे मन, तू मुकंद की शरण में जा।
स्थायी विमल भाव धर अंतःकरना Vimal bhaav dhar antahkarnaa अंतःकरण में निर्मल भाव धारण कर।
स्थायी टूटत सब भव फंदा Tutat sab bhav phandaa भव के सब फंदे टूटते हैं।
स्थायी जाय शरन तु मुकंदा Jaay sharan tu Mukunda तू मुकंद की शरण में जा।
अंतरा मेरा मेरा ना कछु तेरा Mera mera na kachhu tera तू ‘मेरा, मेरा’ कहता है, पर कुछ भी तेरा नहीं।
अंतरा झूंठा कलजुग धंदा Jhunthaa kaljug dhandaa कलियुग का यह धंधा झूठा है।
अंतरा दो दिन को जग चतुर समझ सब Do din ko jag Chatur samajh sab चतुर, यह सब समझ ले: जग दो दिन का है।
अंतरा सांच एक गोबींदा Saanch ek Govinda एक गोविंद ही सत्य हैं।

शब्दार्थ

विमल भाव निर्मल, निष्कपट भाव है; अंतःकरना अंतःकरण या भीतर के मन को कहता है। भव फंदा में संसार के बंधन फंदों की तरह हैं। धंदा सांसारिक काम-धंधा या व्यवहार है। सांच सत्य है।

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