नेक चाल चलिए चतुर
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | नेक चाल चलिए चतुर | Nek chaal chaliye Chatur | चतुर, नेक चाल चलो। |
| स्थायी | प्रभु सों डरिए गरब न करिए | Prabhu son dariye garab na kariye | प्रभु का भय मानो; घमंड मत करो। |
| स्थायी | नाहिं भरोसो या नर तन को | Naahin bharoso yaa nar tan ko | इस मानव तन का कोई भरोसा नहीं। |
| अंतरा | हररंग कहे उपदेस बचन अब | Harrang kahe updes bachan ab | हररंग अब यह उपदेश कहते हैं: |
| अंतरा | समझ समझ पग जग में धरिए | Samajh samajh pag jag men dhariye | इस जग में हर पग सोच-समझकर रखो। |
| अंतरा | मनुष जनम नहिं बार बार यहाँ | Manush janam nahin baar baar yahaan | यहाँ मनुष्य-जन्म बार-बार नहीं मिलता। |
| अंतरा | करना हो सो करिए चतुर | Karnaa ho so kariye Chatur | चतुर, जो करना हो, वह कर लो। |
शब्दार्थ
नेक चाल अच्छा आचरण है। गरब गर्व या घमंड को और उपदेस बचन सीख के वचनों को कहता है। समझ की पुनरावृत्ति हर काम सोच-विचारकर करने को उभारती है। मनुष जनम मनुष्य-जन्म या मानव जीवन है।