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नेक चाल चलिए चतुर

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग तोड़ी
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी नेक चाल चलिए चतुर Nek chaal chaliye Chatur चतुर, नेक चाल चलो।
स्थायी प्रभु सों डरिए गरब न करिए Prabhu son dariye garab na kariye प्रभु का भय मानो; घमंड मत करो।
स्थायी नाहिं भरोसो या नर तन को Naahin bharoso yaa nar tan ko इस मानव तन का कोई भरोसा नहीं।
अंतरा हररंग कहे उपदेस बचन अब Harrang kahe updes bachan ab हररंग अब यह उपदेश कहते हैं:
अंतरा समझ समझ पग जग में धरिए Samajh samajh pag jag men dhariye इस जग में हर पग सोच-समझकर रखो।
अंतरा मनुष जनम नहिं बार बार यहाँ Manush janam nahin baar baar yahaan यहाँ मनुष्य-जन्म बार-बार नहीं मिलता।
अंतरा करना हो सो करिए चतुर Karnaa ho so kariye Chatur चतुर, जो करना हो, वह कर लो।

शब्दार्थ

नेक चाल अच्छा आचरण है। गरब गर्व या घमंड को और उपदेस बचन सीख के वचनों को कहता है। समझ की पुनरावृत्ति हर काम सोच-विचारकर करने को उभारती है। मनुष जनम मनुष्य-जन्म या मानव जीवन है।

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