आहत अनहत भेद नाद के
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | आहत अनहत भेद नाद के | Aahat anahat bhed naad ke | नाद के दो भेद हैं: आहत और अनाहत। |
| स्थायी | प्रथम भेद श्रुतियन सों होवे | Pratham bhed shrutiyan son hove | पहला भेद सुनने से अनुभव होता है। |
| स्थायी | अनहत मुनिजन ध्यान धरत जब | Anahat munijan dhyaan dharat jab | अनाहत नाद मुनियों के ध्यान में अनुभव होता है। |
| अंतरा | नाभि कंठ और मूर्धस्थान सों | Naabhi kanth aur murdhasthaan son | नाभि, कंठ और सिर के स्थान से, |
| अंतरा | मंद्र मध्य और तार होवत | Mandra madhya aur taar hovat | मंद्र, मध्य और तार स्वर-स्थान उत्पन्न होते हैं। |
| अंतरा | सत सुरन के नाम बखाने | Sat suran ke naam bakhaane | सात स्वरों के नाम बताए गए हैं। |
शब्दार्थ
आहत आघात से उत्पन्न ध्वनि है और अनहत ध्यान से जुड़े अनाहत नाद का बोध कराता है। मंद्र, मध्य और तार क्रमशः नीचे, बीच और ऊँचे स्वर-स्थान हैं। नाभि, कंठ और मूर्धस्थान इन स्वर-स्थानों को शरीर के केंद्रों से जोड़ते हैं।