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भज हरिनाम तू मोरे मनवा

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग यमन
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय विलंबित

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी भज हरिनाम तू मोरे मनवा Bhaj harinaam tu more manava मेरे मन, हरि का नाम भज।
स्थायी सब सुखकारक भवभयहारक Sab sukhakaarak bhavabhayahaarak वह सब सुख देता है और संसार का भय हरता है।
स्थायी पूरन होत सकल तेरे काम Puran hot sakal tere kaam तुम्हारे सभी काम पूरे होते हैं।
अंतरा यह संसार घड़ी का सपना Yah sansaar ghari ka sapana यह संसार घड़ी भर का सपना है।
अंतरा सांच एक चतुर को नाम Saanch ek Chatur ko naam चतुर, एक नाम ही सत्य है।

शब्दार्थ

हरिनाम स्मरण में लिया जाने वाला हरि का नाम है। भवभयहारक संसार के भय और उसके हरण को जोड़ता है। घड़ी के सपने का बिंब संसार के बीतते रूप को नाम की स्थायी सच्चाई के सामने रखता है।

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