भज हरिनाम तू मोरे मनवा
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | भज हरिनाम तू मोरे मनवा | Bhaj harinaam tu more manava | मेरे मन, हरि का नाम भज। |
| स्थायी | सब सुखकारक भवभयहारक | Sab sukhakaarak bhavabhayahaarak | वह सब सुख देता है और संसार का भय हरता है। |
| स्थायी | पूरन होत सकल तेरे काम | Puran hot sakal tere kaam | तुम्हारे सभी काम पूरे होते हैं। |
| अंतरा | यह संसार घड़ी का सपना | Yah sansaar ghari ka sapana | यह संसार घड़ी भर का सपना है। |
| अंतरा | सांच एक चतुर को नाम | Saanch ek Chatur ko naam | चतुर, एक नाम ही सत्य है। |
शब्दार्थ
हरिनाम स्मरण में लिया जाने वाला हरि का नाम है। भवभयहारक संसार के भय और उसके हरण को जोड़ता है। घड़ी के सपने का बिंब संसार के बीतते रूप को नाम की स्थायी सच्चाई के सामने रखता है।