भज मन करुणानिधान
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | भज मन करुणानिधान | Bhaj man Karunanidhan | हे मन, करुणा के भंडार करुणानिधान का भजन कर। |
| स्थायी | सुख संपद एक धाम | Sukh sampad ek dhaam | सुख और समृद्धि का एकमात्र धाम। |
| स्थायी | शरणागत वत्सल प्रभु | Sharanaagat vatsal prabhu | प्रभु शरण लेने वालों से स्नेह करते हैं। |
| स्थायी | पूरत सब मन सुकाम | Purat sab man sukaam | वे मन की सभी शुभ कामनाएँ पूरी करते हैं। |
| अंतरा | मंगल सुखदायक प्रभु | Mangal sukhadaayak prabhu | प्रभु मंगल और सुख देने वाले हैं। |
| अंतरा | अखिल जगत नायक विभु | Akhil jagat naayak vibhu | सारे जगत के नायक और सर्वव्यापी। |
| अंतरा | अंतरयामी अविकल | Antarayaami avikal | भीतर की बात जानने वाले, पूर्ण और अविचल। |
| अंतरा | निरगुन कर चतुर ध्यान | Niragun kar Chatur dhyaan | चतुर, गुणों से परे परमात्मा का ध्यान कर। |
शब्दार्थ
शरणागत आश्रय लेने वाले को कहते हैं और वत्सल में स्नेहभरी देखभाल का भाव है। विभु सर्वव्यापकता व्यक्त करता है, जबकि अंतरयामी भीतर की बात जानने वाले को कहता है। निरगुन निश्चित गुणों से परे होने का बोध कराता है।