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गुरु बिन कैसे गुन गावे

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग यमन
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी गुरु बिन कैसे गुन गावे Guru bin kaise gun gaave गुरु के बिना गायन में निपुणता कैसे आए?
स्थायी गुरु न माने तो गुन नहिं आवे Guru na maane to gun nahin aave गुरु की बात न मानने पर गायन का गुण नहीं आता।
स्थायी गुनियन में वे गुनी कहावे Guniyan men ve guni kahaave ऐसा व्यक्ति गुणी संगीतज्ञों के बीच गुणी कहलाता है।
अंतरा माने तो री भावे सबको Maane to ri bhaave sabko सखी, सीख को मानने पर गायन सबको भाता है।
अंतरा चरन गहे सादीकन के जब Charan gahe saadikan ke jab जब ‘सादीकन’ के चरणों का आश्रय लिया जाता है,
अंतरा आवे अचपल ताल सुर Aave achapal taal sur तब ताल और सुर में स्थिरता आती है।

शब्दार्थ

यहाँ गुन संगीत की निपुणता के लिए है, धन या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए नहीं। चरन गहे किसी के चरणों का आश्रय लेने का भाव है। अचपल स्थिरता को कहता है और सीखने की लगन को ताल-सुर की साधना से जोड़ता है।

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