गुरु बिन कैसे गुन गावे
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | गुरु बिन कैसे गुन गावे | Guru bin kaise gun gaave | गुरु के बिना गायन में निपुणता कैसे आए? |
| स्थायी | गुरु न माने तो गुन नहिं आवे | Guru na maane to gun nahin aave | गुरु की बात न मानने पर गायन का गुण नहीं आता। |
| स्थायी | गुनियन में वे गुनी कहावे | Guniyan men ve guni kahaave | ऐसा व्यक्ति गुणी संगीतज्ञों के बीच गुणी कहलाता है। |
| अंतरा | माने तो री भावे सबको | Maane to ri bhaave sabko | सखी, सीख को मानने पर गायन सबको भाता है। |
| अंतरा | चरन गहे सादीकन के जब | Charan gahe saadikan ke jab | जब ‘सादीकन’ के चरणों का आश्रय लिया जाता है, |
| अंतरा | आवे अचपल ताल सुर | Aave achapal taal sur | तब ताल और सुर में स्थिरता आती है। |
शब्दार्थ
यहाँ गुन संगीत की निपुणता के लिए है, धन या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए नहीं। चरन गहे किसी के चरणों का आश्रय लेने का भाव है। अचपल स्थिरता को कहता है और सीखने की लगन को ताल-सुर की साधना से जोड़ता है।