कहो सखी पिया कें दरस कै मे पाऊं
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | कहो सखी पिया कें दरस कै मे पाऊं | Kaho sakhi piya ken daras kai me paaun | सखी, बताओ मैं प्रिय के दर्शन कैसे पाऊँ? |
| स्थायी | कल न परत मोंहे घरि पल छिन | Kal na parat monhe ghari pal chhin | मुझे घड़ी-पल-छिन भर भी चैन नहीं मिलता। |
| अंतरा | जब से गये मोंरी सुधहु न लीनी | Jab se gaye monri sudhahu na lini | जब से प्रिय गए हैं, उन्होंने मेरी सुध नहीं ली है। |
| अंतरा | तरफत जियरा मीन जल बिन | Tarafat jiyara min jal bin | मेरा हृदय जल के बिना मछली की तरह तड़पता है। |
शब्दार्थ
दरस प्रिय को देखने की अभिलाषा है और कल न परत चैन न मिलने को कहता है। घरि, पल और छिन जैसे छोटे समय-खंड लगातार व्याकुल रहने का भाव बढ़ाते हैं। सुध न लीनी किसी का ध्यान न रखने को कहता है और जल बिना मछली वियोग की पीड़ा का बिंब है।