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कहो सखी पिया कें दरस कै मे पाऊं

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग यमन
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी कहो सखी पिया कें दरस कै मे पाऊं Kaho sakhi piya ken daras kai me paaun सखी, बताओ मैं प्रिय के दर्शन कैसे पाऊँ?
स्थायी कल न परत मोंहे घरि पल छिन Kal na parat monhe ghari pal chhin मुझे घड़ी-पल-छिन भर भी चैन नहीं मिलता।
अंतरा जब से गये मोंरी सुधहु न लीनी Jab se gaye monri sudhahu na lini जब से प्रिय गए हैं, उन्होंने मेरी सुध नहीं ली है।
अंतरा तरफत जियरा मीन जल बिन Tarafat jiyara min jal bin मेरा हृदय जल के बिना मछली की तरह तड़पता है।

शब्दार्थ

दरस प्रिय को देखने की अभिलाषा है और कल न परत चैन न मिलने को कहता है। घरि, पल और छिन जैसे छोटे समय-खंड लगातार व्याकुल रहने का भाव बढ़ाते हैं। सुध न लीनी किसी का ध्यान न रखने को कहता है और जल बिना मछली वियोग की पीड़ा का बिंब है।

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