सदाशिव भज मना निस दिन
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सदाशिव भज मना निस दिन | Sadashiv bhaj mana nis din | हे मन, रात-दिन सदाशिव का भजन कर। |
| स्थायी | रिधि सिधि दायक बिनत सहायक | Ridhi sidhi daayak binat sahaayak | वे समृद्धि और आध्यात्मिक सिद्धि देते हैं तथा विनती करने वालों की सहायता करते हैं। |
| स्थायी | नाहक भटकत फिरत अनवरत | Naahak bhatakat phirat anavarat | तू व्यर्थ ही लगातार भटकता फिरता है। |
| अंतरा | शंकर भोला पारवती रमण | Shankar Bhola Parvati raman | भोले शंकर, पारवती के प्रिय, |
| अंतरा | सित तन पंनग भूषन अनुपम | Sit tan pannag bhushan anupam | जिनका उजला शरीर सर्पों से सुशोभित है और जिनका रूप अनुपम है। |
| अंतरा | काहे न सुमिरत भटकत तू फिरत | Kaahe na sumirat bhatakat tu phirat | तू उन्हें क्यों नहीं स्मरण करता, क्यों भटकता फिरता है? |
शब्दार्थ
निस दिन का अर्थ रात-दिन है और सुमिरत स्मरण करने को कहता है। रिधि और सिधि समृद्धि तथा आध्यात्मिक सिद्धि का बोध कराते हैं। सित उजले शरीर के लिए और पंनग सर्पों के लिए आया है, जो यहाँ आभूषण हैं।