अति प्रताप तेरो जग में हों
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | अति प्रताप तेरो जग में हों | Ati prataap tero jag men hon | जगत में तुम्हारा प्रताप बहुत बड़ा है। |
| स्थायी | रावरा जे आहादर | Raavara je aahaadar | ‘रावरा जे आहादर’। |
| अंतरा | नाम सुनत गुनि आवत धाय धाय | Naam sunat guni aavat dhaay dhaay | तुम्हारा नाम सुनकर गुणी जन बार-बार दौड़े आते हैं। |
| अंतरा | पावत मन इछा फल | Paavat man ichha phal | वे मन की चाह का फल पाते हैं। |
| अंतरा | तिनको आधार | Tinako aadhaar | तुम उनका आधार हो। |
शब्दार्थ
प्रताप में तेज, सामर्थ्य और कीर्ति का भाव है। गुनि गुणी या निपुण जनों को कहते हैं और धाय की पुनरावृत्ति उनके उत्साह से आने को व्यक्त करती है। मन इछा फल मन की चाह पूरी होने का भाव है।