गंगाधर त्रिनयन सूलपानि
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | गंगाधर त्रिनयन सूलपानि | Gangadhar Trinayan Sulpani | गंगा को धारण करने वाले, तीन नेत्रों वाले, त्रिशूलधारी। |
| स्थायी | भस्म अंग नीलकंठ | Bhasm ang Neelkanth | अंगों पर भस्म, नीला कंठ। |
| स्थायी | गौरी अरधंगा | Gauri ardhanga | गौरी उनका अर्धांग हैं। |
| अंतरा | कर त्रिसूल गरे मुंडमाल | Kar trisul gare mundmaal | हाथ में त्रिशूल, गले में मुंडों की माला। |
| अंतरा | भाल चंद्र मृत्युंजय | Bhaal chandra Mrityunjay | भाल पर चंद्रमा, मृत्यु को जीतने वाले। |
| अंतरा | भृंगी सोहे भूत संग | Bhringi sohe bhut sang | भृंगी भूतों के संग शोभते हैं। |
शब्दार्थ
त्रिनयन तीन नेत्रों वाले को और सूलपानि त्रिशूल धारण करने वाले को कहता है। भस्म राख है और मुंडमाल मुंडों की माला है। मृत्युंजय मृत्यु को जीतने वाले का नाम है और संग का अर्थ साथ है।