सब मिलि गावो बजावो मिरदंग
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | सब मिलि गावो बजावो मिरदंग | Sab mili gaavo bajaavo mirdang | सब मिलकर गाओ और मिरदंग बजाओ। |
| स्थायी | आज हमारे लालन जू की बरसगांठ | Aaj hamaare laalan ju ki barsagaanth | आज हमारे लालन जी की वर्षगाँठ है। |
| अंतरा | कनक थार भर भर | Kanak thaar bhar bhar | सोने के थाल भर-भरकर, |
| अंतरा | मूक्ता फल कर | Mukta phal kar | हाथ में मोती लेकर, |
| अंतरा | करि न्यौछावर पायो | Kari nyauchhaavar paayo | न्योछावर करके उन्होंने पाया… |
| संचारी | नव नव पल्लवन की माला | Nav nav pallavan ki maala | नए-नए पल्लवों की मालाएँ— |
| संचारी | द्वारन द्वारन बंधायो | Dvaaran dvaaran bandhaayo | द्वार-द्वार उन्हें बँधवाओ। |
| आभोग | बंसीधर प्रभु को जस सुनियत है | Bansidhar prabhu ko jas suniyat hai | बंसीधर प्रभु का यश सुनाई देता है। |
| आभोग | सबही को लागत है सुहायो | Sabhi ko laagat hai suhaayo | वह सभी को सुहावना लगता है। |
शब्दार्थ
कनक सोना है और थार थाल को कहता है। मूक्ता फल मोती हैं और न्यौछावर स्नेह या उत्सव में किया गया अर्पण है। पल्लवन नए पत्ते हैं और जस यश या प्रशंसा है। कर का अर्थ हाथ भी है।