अरे मन हर सौं करे तु प्रीत
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | अरे मन हर सौं करे तु प्रीत | Are man Har saun kare tu prit | हे मन, हर से प्रेम कर। |
| स्थायी | मात पिता साहि अखिल जगत को | Maat pita saahi akhil jagat ko | सारे जगत के माता, पिता और स्वामी। |
| स्थायी | अंतस मै ना दूजो को मीत | Antas mai na dujo ko mit | मेरे अंतस में कोई दूसरा मित्र नहीं है। |
| अंतरा | यह संसारा झूठ पसारा | Yah sansaara jhuth pasaara | यह संसार झूठा पसारा है। |
| अंतरा | हररंग कहे जूं सिकता कि भीत | Harrang kahe jun sikata ki bhit | हररंग कहते हैं: जैसे रेत की दीवार। |
शब्दार्थ
प्रीत प्रेम या समर्पित लगाव है। झूठ पसारा संसार को भरोसेमंद न रहने वाला विस्तार कहता है। सिकता कि भीत उसकी तुलना रेत की दीवार से करता है, जो स्थायी सहारा नहीं दे सकती।