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अरे मन हर सौं करे तु प्रीत

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग खमाज
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी अरे मन हर सौं करे तु प्रीत Are man Har saun kare tu prit हे मन, हर से प्रेम कर।
स्थायी मात पिता साहि अखिल जगत को Maat pita saahi akhil jagat ko सारे जगत के माता, पिता और स्वामी।
स्थायी अंतस मै ना दूजो को मीत Antas mai na dujo ko mit मेरे अंतस में कोई दूसरा मित्र नहीं है।
अंतरा यह संसारा झूठ पसारा Yah sansaara jhuth pasaara यह संसार झूठा पसारा है।
अंतरा हररंग कहे जूं सिकता कि भीत Harrang kahe jun sikata ki bhit हररंग कहते हैं: जैसे रेत की दीवार।

शब्दार्थ

प्रीत प्रेम या समर्पित लगाव है। झूठ पसारा संसार को भरोसेमंद न रहने वाला विस्तार कहता है। सिकता कि भीत उसकी तुलना रेत की दीवार से करता है, जो स्थायी सहारा नहीं दे सकती।

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