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लाग रह्यो मन राधावर से

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग खमाज
विधा भजन
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी लाग रह्यो मन राधावर से Laag rahyo man Radhavar se मेरा मन राधा के प्रिय से लगा रहता है।
स्थायी और कहे कछु और उपर से Aur kahe kachhu aur upar se कहा कुछ जाता है और ऊपर से कुछ और जताया जाता है।
अंतरा दिन रतियाँ अँखियाँ आगे मेरी Din ratiyaan ankhiyaan aage meri दिन-रात मेरी आँखों के आगे,
अंतरा ठाड़े रहे कछु रूप सुधर से Thaare rahe kachhu rup sudhar se वह सुंदर रूप खड़ा रहता है।
अंतरा आनंद घन प्रभु लाए नेहा Aanand ghan prabhu laaye neha आनंद से भरे प्रभु ने प्रेम जगाया है।
अंतरा प्रेम रँगूँगी मैं गिरिधर वर से Prem rangungi main Giridhar var se मैं अपने प्रिय गिरिधर के प्रेम में रँगूँगी।

शब्दार्थ

राधावर राधा के प्रिय का संबोधन है और गिरिधर पर्वत उठाने वाले कृष्ण का नाम है। दिन रतियाँ में दिन-रात का विस्तार है और नेहा प्रेम का शब्द है। रँगूँगी अपने को प्रेम के रंग में रँगने और उससे बदल जाने का भाव व्यक्त करता है।

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