लाग रह्यो मन राधावर से
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | लाग रह्यो मन राधावर से | Laag rahyo man Radhavar se | मेरा मन राधा के प्रिय से लगा रहता है। |
| स्थायी | और कहे कछु और उपर से | Aur kahe kachhu aur upar se | कहा कुछ जाता है और ऊपर से कुछ और जताया जाता है। |
| अंतरा | दिन रतियाँ अँखियाँ आगे मेरी | Din ratiyaan ankhiyaan aage meri | दिन-रात मेरी आँखों के आगे, |
| अंतरा | ठाड़े रहे कछु रूप सुधर से | Thaare rahe kachhu rup sudhar se | वह सुंदर रूप खड़ा रहता है। |
| अंतरा | आनंद घन प्रभु लाए नेहा | Aanand ghan prabhu laaye neha | आनंद से भरे प्रभु ने प्रेम जगाया है। |
| अंतरा | प्रेम रँगूँगी मैं गिरिधर वर से | Prem rangungi main Giridhar var se | मैं अपने प्रिय गिरिधर के प्रेम में रँगूँगी। |
शब्दार्थ
राधावर राधा के प्रिय का संबोधन है और गिरिधर पर्वत उठाने वाले कृष्ण का नाम है। दिन रतियाँ में दिन-रात का विस्तार है और नेहा प्रेम का शब्द है। रँगूँगी अपने को प्रेम के रंग में रँगने और उससे बदल जाने का भाव व्यक्त करता है।