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मोरे सैंयां नहिं आये मैं का रि करूं

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग खमाज
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी मोरे सैंयां नहिं आये मैं का रि करूं More sainyaan nahin aaye main ka ri karun मेरे प्रिय नहीं आए; सखी, मैं क्या करूँ?
स्थायी सैंयां नहिं आये का रि करूं Sainyaan nahin aaye ka ri karun प्रिय नहीं आए; सखी, क्या किया जाए?
अंतरा कासें कहूँ अब एरी सखि Kaasen kahun ab eri sakhi अब किससे कहूँ, मेरी सखी?
अंतरा जिया घबरावे मैं का रि करूं Jiya ghabraave main ka ri karun मन घबरा रहा है; सखी, मैं क्या करूँ?

शब्दार्थ

सैंयां प्रिय का स्नेहभरा संबोधन है। रि और एरी सखी को पुकारते हैं, जबकि कासें में किससे कहने का प्रश्न है। क्या करूँ की पुनरावृत्ति प्रतीक्षा की घबराहट को स्वर देती है।

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