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न मानुँगी न मानुँगी न मानुँगी

गीत-पाठ और भावार्थ।

इस रचना का परिचय

विवरण जानकारी
राग खमाज
विधा ख़याल
ताल तीनताल · 16 मात्राएँ
लय मध्य

पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ

अंग गीत-पाठ रोमन लिप्यंतरण भावार्थ
स्थायी न मानुँगी न मानुँगी न मानुँगी Na maanungi na maanungi na maanungi न मानूँगी, न मानूँगी, न मानूँगी।
स्थायी मैं तो उन्हीं के मनाये बिना Main to unhin ke manaaye bina मैं तो उनके मनाए बिना नहीं।
अंतरा जाओ जि जाओ जि सखि वे तो अपने Jaao ji jaao ji sakhi ve to apne जाओ जी, जाओ जी, सखि; वे तो अपने—
अंतरा रस के रसिया न जाऊंगी न जाऊंगी न जाऊंगी Ras ke rasiya na jaaungi na jaaungi na jaaungi रस के रसिक हैं। न जाऊँगी, न जाऊँगी, न जाऊँगी।
अंतरा मैं तो उन्हीं के मनाये बिना Main to unhin ke manaaye bina मैं तो उनके मनाए बिना नहीं।

शब्दार्थ

मनाये किसी को समझा-बुझाकर राज़ी करने को कहता है। रसिया रस या आनंद में रमने वाले को कहते हैं। बार-बार का इनकार वक्ता के निश्चय को बल देता है।

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