न मानुँगी न मानुँगी न मानुँगी
गीत-पाठ और भावार्थ।
इस रचना का परिचय
पूरा गीत-पाठ, लिप्यंतरण और भावार्थ
| अंग | गीत-पाठ | रोमन लिप्यंतरण | भावार्थ |
|---|---|---|---|
| स्थायी | न मानुँगी न मानुँगी न मानुँगी | Na maanungi na maanungi na maanungi | न मानूँगी, न मानूँगी, न मानूँगी। |
| स्थायी | मैं तो उन्हीं के मनाये बिना | Main to unhin ke manaaye bina | मैं तो उनके मनाए बिना नहीं। |
| अंतरा | जाओ जि जाओ जि सखि वे तो अपने | Jaao ji jaao ji sakhi ve to apne | जाओ जी, जाओ जी, सखि; वे तो अपने— |
| अंतरा | रस के रसिया न जाऊंगी न जाऊंगी न जाऊंगी | Ras ke rasiya na jaaungi na jaaungi na jaaungi | रस के रसिक हैं। न जाऊँगी, न जाऊँगी, न जाऊँगी। |
| अंतरा | मैं तो उन्हीं के मनाये बिना | Main to unhin ke manaaye bina | मैं तो उनके मनाए बिना नहीं। |
शब्दार्थ
मनाये किसी को समझा-बुझाकर राज़ी करने को कहता है। रसिया रस या आनंद में रमने वाले को कहते हैं। बार-बार का इनकार वक्ता के निश्चय को बल देता है।